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 1932 का खतियान, ऐतिहासिक फैसला, या फिर 'ब्लेम गेम' 1932 आधारित स्थानीय नीति और ओबीसी आरक्षण का फैसला क्या झारखंड की सरकार के लिए क्या फायदेमंद होगा, या फिर सिर्फ ब्लेम गेम तक ही सीमित रह जायेगा. क्याेंकि इससे लाभ कम और आने वाले चुनाव में ब्लेम गेम की बू ज्यादा दिख रही है. वरिष्ठ पत्रकार पंकज पाठक ने इस पर विस्तृत जानकारी दी है.  1932 आधारित स्थानीय नीति और ओबीसी आरक्षण का फैसला : कहां - कहां फसेगा पेंच ? 1932 के आधार पर स्थानीय नीति लागू कर दी गयी. ओबीसी आरक्षण पर भी फैसला ले लिया गया. क्या झारखंड अब अपनी रफ्तार पकड़ सकेगा ? क्या सच में झारखंडियों को अपना अधिकार मिल गया ? सारे विरोध, सारे आंदोलन इस फैसले के बाद खत्म हो जायेंगे या यह फैसला एक बार फिर कोर्ट की दहलीज पर राज्य के विकास की रफ्तार को रोक देगा . कल झारखंड कैबिनेट ने कुल  41 प्रस्तावों को मंजूरी दी लेकिन खबर इन दो बड़े फैसलों को लेकर है. कैबिनेट के प्रस्ताव के बाद अब आगे क्या होगा ? आरक्षण को कैबिनेट की मंजूरी  मिली है लेकिन क्या राह होगी आसान ?1932 खतियान आधारित नीति में कौन- कौन सी समस्या आ सकती है ? नारे...

योग्यता पर भारी 'जाति', क्या ऐसे चलेगी यूपी की राजनीति

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उत्तरप्रदेश में आज योगी आदित्यनाथ ने बतौर मुख्यमंत्री दूसरे कार्यकाल की शपथ ली. लखनऊ के इकाना स्टेडियम में आयोजित भव्य कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने 52 मंत्रियों ने शपथ ली. इसमें कई विधान परिषद के भी सदस्य हैं. कहा जाता है सरकार ने जातीय समीकरण साधा है. दूसरी पार्टियों ने आने वाले दलबदलू नेता इस बार भी मंत्री बनने में कामयाब रहे, लेकिन पार्टी की ओर से जीत की हैट्रिक लगाने वाले सिर्फ ताली भी बजाते रहे. आइये आपको बताते हैं कौन कौन मंत्री बना है. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को छोड़कर कुल 52 सदस्यीय मंत्रिमंडल का गठन किया गया है. सीएम के अलावा 18 कैबिनेट मंत्रियों, 14 राज्यमंत्रियो और 20 राज्यमंत्रियों काे पद दिया गया है. सवर्ण समुदाय के 21 मंत्री मुख्यमंत्री आदित्यनाथ सहित मंत्रिमंडल में कुल 21 सवर्ण मंत्री बनाए गए हैं, जिनमें 7 ब्राह्मण, तीन वैश्य और आदित्यनाथ को मिलाकर 8 ठाकुर हैं. इसके अलावा दो भूमिहार और एक कायस्थ को जगह मिली है. 8 क्षत्रिय मंत्री मुख्यमंत्री के अलावा एक कैबिनेट मंत्री जयवीर सिंह को बनाया गया है. वहीं, तीन स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री बनाए गए हैं, जिनमें ब...

कोविड-19 की नयी दवा के ट्रायल में पटना एम्स भी हुआ शामिल

देश में कोविड-19 की नयी दवा का ट्रायल होनेवाला है. इसमें एम्स पटना को भी शामिल किया गया है. दरअसल,  कोविड-19 की नयी दवा 'बीबीवी-152 कोविड वैक्सीन' के ट्रायल में पटना के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान भी अपना योगदान देगा. ट्रायल देश के 13 नामी संस्थाओं को शामिल किया गया है, जहां पर इसका ट्रायल 15 अगस्त के पहले पूरा किया जाना है. कोविड-19 की नयी दवा का ट्रायल इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) और भारत बायोटेक इंटरनेशलन लिमिटेड के संयुक्त कोलेबरेशन में कराया जा रहा है. आइसीएमआर के सचिव प्रो (डॉ) बलराम भार्गव द्वारा इस आशय का पत्र देश के सभी संस्थानों के भेजते हुए सात जुलाई तक आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है. मालूम हो कि राज्य में कोरोना पॉजिटिवों की संख्या में तेजी से प्रसार हो रहा है. राज्य में कोरोना पॉजिटिव होनेवालों की संख्या अब 11 हजार से पार हो चुकी है. पटना एम्स को कोरोना पॉजिटिव मरीजों के इलाज के लिए डेडिकेटेड भी किया गया है. राज्य का पहला कोरोना पॉजिटिव भी एम्स पटना में ही पाया गया था.  भारत बायोटेक की ओर से बनायी गयी कोवैक्सीन को ह्यूमन ट्रायल ...

क्‍या 15 अगस्‍त को लॉन्‍च होगी कोरोना का वैक्‍सीन?

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देश-दुनिया में कोरोना का कहर लगातार बढ़ता जा रहा है. भारत में ही कोरोना का आंकड़ा अब सात लाख को छूने वाला है. इस बीच कोविड-19 वैक्‍सीन को लेकर भी दुनियाभर में कवायद तेज हो चली है. सभी देश वैक्‍सीन बनाने में लगे हुए हैं, लेकिन भारत ने पूरी दुनिया में उस समय तहलका मचा दिया, जब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की ओर घोषणा की गयी कि 15 अगस्‍त तक भारत कोरोना का वैक्‍सीन बना लेगा.  हालांकि ‘मेड इन इंडिया' टीका कार्यक्रम की जहां तारीफ हो रही है, वहीं इसको लेकर आशंकाएं और विवाद भी गहराता जा रहा है. वैज्ञानिकों ने भी भारत के इस प्रयास पर सतर्क रहने की सलाह दे दी है. वैक्‍सीन को लेकर जब विवाद गहरा गया, तो ICMR ने अपना पक्ष रखा और कहा, टीका निर्माण का काम विश्व स्‍तर पर स्‍वीकृत मानदंडों को ध्‍यान में रखकर ही बनाया जा रहा है. जिसमें मानव और पशु परीक्षण समानांतर रूप से जारी रह सकते हैं. ICMR ने साफ कर दिया है कि इसमें लोगों की सुरक्षा को भी खासा ध्‍यान दिया जा रहा है.  आईसीएमआर ने कहा कि वह महामारी के लिए तेजी से टीका बनाने के वैश्विक रूप से स्वीकार्य सभी नियमों के अनुरूप का...

सुषमा स्वराज का 67 साल की उम्र में निधन

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भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का मंगलवार (6 अगस्त 2019) रात निधन हो गया। मध्यप्रदेश के विदिशा से सांसद रही स्वराज को को रात करीब दस बजे दिल का दौरा पड़ा। परिजन उन्हें एम्स लेकर आये। वे 67 वर्ष की थीं.  एम्स के सूत्रों के मुताबिक सुषमा स्वराज को रात 10 बजकर 15 मिनट पर अस्पताल लाया गया। उन्हें सीधे आपातकालीन वॉर्ड में ले जाया गया। सुश्री स्वराज का का 2016 में गुर्दा प्रत्यारोपित किया गया था। लम्बे समय से उनका स्वास्थ ठीक नहीं था। र्विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को तबियत बिगड़ने पर रात में एम्स लाया गया था। सूचना मिलते ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन भी एम्स पहुंच गए थे। गौरतलब है पिछले कुछ दिनों से सुषमा स्वराज की तबीयत ख़राब था. इसी वजह से उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी नहीं लड़ा था। विदेश मंत्री रहते उनका कार्यकाल बेहद सराहनीय रहा। आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी दोनों की बेहद करीबी और प्रिय रही हैं स्वराज। अटल जी के मध्यप्रदेश की विदिशा सीट छोड़ने के बाद उनकी ये विरासत सुषमा स्वराज के हाथ ही रही। वे विदिशा से दो बार सांसद चुनी गई.

सोनिया के पीएम पद की राह में पहाड़ बन गयीं थीं सुषमा स्वराज

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कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने में सुषमा स्वराज की बड़ी भूमिका थी। सुश्री स्वराज ने सोनिया के विदेशी मूल का जमकर विरोध किया। स्वराज ने ये तक कह दिया कि 125 करोड़ की आबादी वाले देश को एक विदेशी को प्रधानमंत्री बनाना पड़े, ये शर्मनाक है। 2004 में लोकसभा चुनाव के नतीजों में कांग्रेस को बहुमत मिला। संभावना बलवती थी कि देश की बागडोर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी संभालेंगी। बस, फिर क्या था। सुषमा स्वराज ने एक आंदोलन का ऐलान कर दिया। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी यदि देश की प्रधानमंत्री बनती हैं तो वह अपना सिर मुंड़वा लेंगी, भुने चने खाएंगी और जमीन पर ही सोएंगी और सफेद साड़ी पहनेंगी। सुषमा ने यह संकल्प लेने की वजह बाद में बताई भी थी। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि भारत 125 करोड़ लोगों का देश है और उनके लिए शर्म की बात थी कि इतने बड़े देश में कांग्रेस पार्टी को एक भारतीय प्रधानमंत्री नहीं मिल रहा था। सुषमा की इस घोषणा के बाद पूरे देश में विदेशी मूल का मुद्दा छा गया। बड़ी संख्या में कांग्रेसी भी सोनिया को विदेशी मानने लगे। देखते ही देखते इस मुद्द...

कहानी कश्मीर की / 1932 से अब तक कश्मीर की पूरी कहानी

इसे दैनिक भास्कर के स्टेट एडिटर श्री नवनीत गुर्जर जी से लिखा है और भास्कर डॉट पर प्रकाशित है. कश्मीर देश के लिए एक दुखती रग रहा और आज भी बना हुआ है? कौन इसके लिए, किस हद तक जिम्मेदार है? किसने, किस हद तक इस मसले पर क्या- क्या कोशिशें कीं? सरदार पटेल के सचिव वीशंकर की किताब ‘सरदार पटेल का चुना हुआ पत्र व्यवहार’ के आधार पर... नेहरू जी के भावुकतापूर्ण अविवेक से नाराज़ थे सरदार पटेल   महाराजा हरिसिंह के शासनकाल में जम्मू- कश्मीर का प्रशासन ठीक था। पहले पॉलिटिकल डिपार्टमेंट द्वारा चुने गए अधिकारियों के मातहत और बाद में गोपाल स्वामी अय्यंगार, महाराज सिंह और बीएन राव जैसे सुयोग्य भारतीय प्रशासकों के कारण। हालांकि, महाराजा खुद भी कार्यक्षम और परिश्रमशील शासक थे, परंतु उनके चरित्र में अनिर्णय अथवा असमंजस का भारी दोष था। 1932 में शेख अब्दुल्ला ने जो लोकप्रिय आंदोलन चलाया, उसके कारण शासन को उदार बनाने का पहला कदम उठाया गया। शुरुआत में यह कौमी आंदोलन था, जो मुसलमानों के हित की लड़ाई लड़ने के लिए खड़ा किया गया था।1939 में आंदोलन का कौमी स्वरूप खत्म कर दिया गया और पहले कश्मीर मुस्ल...