दलेर मेहंदी का सफरनामा: सिंह इज किंग

जन्म से पहले ही संगीत से जुड़े दलेर मेहंदी ने अमेरिका में टैक्सी भी चलाई है और भारत में डेढ़ सौ रुपए में स्टेज शो भी किए हैं। दलेर ने करोड़ों कमाए, समाज के लिए ख़र्च भी किए। उन्हें ख़ूब शोहरत मिली, तो उन पर ‘कबूतरबाज़ी’ के आरोप भी लगे। ‘सिंह इज़ किंग’ टाइटल के पहले हक़दार बने दलेर सुना रहे हैं अपना दिलचस्प सफ़रनामा..
मेरा जन्म 18 अगस्त, 1967 को अविभाजित बिहार में हुआ। जब मैं गर्भ में था, मेरी मां बलबीर कौर संगीत सीख रही थीं। डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह दी, पर उस्ताद बुलाकी बाबू ने रियाज जारी रखने का सुझाव दिया। दरअसल, उस्ताद जी का मानना था कि यही सही व़क्त है, जब वे संगीत साधना करेंगी, तो उसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे यानी मेरे ऊपर पड़ेगा। इसीलिए मैं कहता हूं कि मेरी सफलता में मेरे माता-पिता का बहुत बड़ा योगदान है।
मैं जब पैदा नहीं हुआ था, तभी उन्होंने मेरा नाम दलेर सिंह रखने का फैसला कर लिया था। मेरी उम्र तब पांच साल रही होगी, जब पिताजी अजमेर सिंह चंदन ने मुझे कुछ शब्द सिखाए थे- ‘मेरे लाल जियो, तेरा अंत न जाणा..’। उस वक्त हम धनबाद में रहते थे, जहां एक गुरुद्वारा था। हर शनिवार-इतवार को जब हम वहां जाते, तो मां-पिताजी कहते- ‘हमारा बेटा शबद-कीर्तन पढ़ेगा और आप इसे आशीर्वाद दें।’ आशीर्वाद लेकर मैं वहां अपना पसंदीदा भजन ‘मेरे लाल..’ गाता था।
सच कहूं, तो मुझे शुरू से यक़ीन था कि मैं गायकी में अपना एक मुकाम बनाऊंगा, पर तब यह नहीं जानता था कि शोहरत पंजाबी गायकी में मिलेगी। संगीत से अलग, बचपन में मुझे फुटबॉल खेलने का बहुत शौक था। अब किसी से कहता हूं तो लोग हंसते हैं कि मज़ाक मत करो यार! कुश्ती देखना भी मुझे पसंद है। जब मैं छोटा था, तो दारा सिंह, किंग कांग और मेहरदीन की कई कुश्तियां देखीं। अब तो डब्ल्यूडब्ल्यूएफ देखता हूं। बहरहाल, बिहार से जब हम दिल्ली आ गए, तब मुझे मेहदी हसन, बेगम अख्‍़तर, बड़े गुलाम अली ख़ां आदि को सुनने का मौक़ा मिला।
यही व़क्त था, जब मेरे अंदर किसी ऐसे उस्ताद का शागिर्द बनने की ख़्वाहिश जगी, जो संगीत के सारे रंग जानता हो। इसी दौरान हम कुछ दोस्त जब घूमने के लिए काठमांडू जा रहे थे, तो गोरखपुर में मुझे ऐसे ही उस्ताद मिले- उस्ताद राहत अली ख़ां साहब। मैंने उन्हें गाना सुनाया, तो अपना शागिर्द बनाकर उन्होंने मुझे दो साल तक तालीम दी। इसके बाद मैं अमेरिका में पहले से रह रहे अपने दो भाइयों के पास चला गया। मैं वहां चलाता तो टैक्सी था, मगर कलाकारों के शो देखता, तो सोचता था कि मुझे भी करना चाहिए।
एक बार की बात है, बर्कले सिटी में बहुत बड़ी भीड़ लगी थी। किसी से पूछा, तो मालूम हुआ कि वहां बीटल्स ग्रुप के सर पॉल मैककर्टनी का शो कई साल बाद हो रहा है, जिसे देखने के लिए साठ हज़ार लोग जमा हुए हैं। मैंने वहां परफॉर्म करने का फैसला किया। और इस तरह बारह घंटे में ही मैंने तीन हज़ार डॉलर की कमाई कर ली, तो वहीं से भारत लौटने की प्रेरणा मिली। भारत आकर मैंने अपना स्ट्रगल तो शुरू कर दिया, पर हर म्यूज़िक कंपनी में यही ताने सुनने को मिलते- ‘क्या तुम पंकज उधास से अच्छा गाते हो या फिर ख़ुद को गुलाम अली से बड़ा गायक समझते हो?’ लेकिन परमजीत खुराना को मेरा गाना पसंद आया, जिन्होंने बताया कि डांस वाले गाने के इस दौर में अभी मेरे जैसे गानों का बाज़ार नहीं है।
लेकिन समस्या यह थी कि मुझे डांस करने में तब बहुत शर्म आती थी। आख़िर मैंने खुराना जी से एक हफ्ते का व़क्त लेकर अपना पहला गाना तैयार किया- ‘एक कुड़ी पटाखा..’। जब वह रिलीज़ हुआ, तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था कि चलो, शुरुआत तो हुई! लेकिन इसके बाद इतना लंबा संघर्ष करना पड़ा कि सोने की चेन-अंगूठी, यहां तक कि मुझे अपना कैमरा तक बेच देना पड़ा।
आख़िर मैं दुखी होकर फिर अमेरिका चला गया। लेकिन वहां एक साल के भीतर ही मुझमें संगीत की वही धुन फिर सवार हो गई। इसी बीच 1992 में ए.जे. जसपाल मेरी ज़िंदगी में फरिश्ता बनकर आए, जो आईटीडीसी में थे। मैं दिल्ली में जब डेढ़ सौ रुपए में एक शो करता था, तब उन्होंने बड़े विश्वास से कहा- ‘तुम्हें हर शो के हज़ार रुपए मिलेंगे। मैं जानता हूं कि तुम गुरदास मान और मलकीत सिंह से भी आगे जाओगे।’
इस तरह सिलसिला आगे बढ़ा तो 1995 में आया- ‘बोलो तारा रा रा..’, जो ज़बर्दस्त हिट रहा। लेकिन अभी मेरे आलोचक इसे तुक्का से ज्यादा कुछ मानने के लिए तैयार नहीं थे। ख़ैर, एक साल बाद ही जब मेरा ‘मैं दर दी रब रब कर दी..’ आया तो सभी के मुंह पर ताले लग गए। मेरे इस गाने की धूम मची थी कि एक दिन मेरे पास बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन का फोन आया कि वे मेरे साथ फिल्म करना चाहते हैं। चूंकि मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं और उनकी एक झलक पाकर आज भी ख़ुशी महसूस करता हूं, इसलिए ‘मृत्युदाता’ में साथ काम करते समय हुई ख़ुशी बयां नहीं कर सकता।
इसके बाद सन् 99 में मैंने ‘तुनक तुनक..’ की योजना बनाई, जिसमें सिर्फ मुझे आना था। हालांकि शशि गोपाल को पहले लग रहा था कि मेरा यह फैसला जोखिम भरा है, पर जब आया तो वह भी हिट रहा। लेकिन जैसा कि संसार का नियम है, सफलता के साथ आप ख़ुद से ईष्र्या करने वालों की तादाद भी बढ़ाते जाते हैं। यही कुछ मेरे साथ भी हुआ। मेरे ऊपर ‘कबूतरबाजी’ का आरोप मढ़ दिया गया। वे तीन महीने मेरे बहुत बुरे गुज़रे। मैंने कभी आंसू नहीं बहाए, पर बुरा ज़रूर लगता था कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है! मुझे ईश्वर पर हमेशा यक़ीन रहा है, इसलिए उस बुरे व़क्त में भी मैं दोस्तों से हंस-हंस कर बातें किया करता था।
मैंने सामाजिक काम भी कम नहीं किए हैं। भुज में आए भूकंप के बाद मैंने जहां 16 घर बनवाए, वहीं कारगिल युद्ध के दौरान भी तमाम मदद की। यही नहीं, सात-आठ साल पहले दिल्ली में जब सीएनजी की बसें नहीं चलती थीं, तब प्रदूषण के मद्देनजर मैंने एक अभियान चलाया और अपने पास से करोड़ों रुपए ख़र्च कर वहां आठ लाख पेड़ लगवाए।
एक दिन छठे गुरु हरगोविंद सिंह जी ने मेरे सपने में दर्शन देकर जब मुझे गुरुद्वारा बनवाने का आदेश दिया, तब मैंने 2003 में न केवल गुरुद्वारा बनवाया, बल्कि आज वहां हर दिन सुबह पांच सौ और रात में ढाई सौ लोग लंगर भी खाते हैं। जी हां, मुझे लंगर देने में बहुत आनंद आता है। यह बात शायद कम ही लोगों को याद होगी कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने आज से चार-पांच साल पहले ही ‘सिंह इज किंग’ टाइटल मुझे दे दिया था।

Comments

Popular posts from this blog

झांसी की रानी का ऐतिहासिक पत्र