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Showing posts from February 5, 2012

बेटे का कफ़न

चल हट बुढ़िया देखती नहीं पुलिस केस है कल से हम राजनवा के बारे में तुमसे पूछ रहे है अभी तक तो कहती रही कि तुम्हे उसका पता नहीं आज जब उसका डकैती के दौरान इनकौन्टर हो गया तो क्यों चिल्ला रही अभी तक तो डकैती का मॉल दकारती रही अब मुंह देख कर क्या करोगी उसे अब देखने से क्या फायदा क्या तुम अब उसे जिन्दा करोगी नाही भईया हमार बबुआ अइसन कबहू ना रहा जरूर तू सभे के कौनो ग़लतफ़हमी होई रहा हाँ एका संगत बीच में कछु गलत होई गवा रहा स्कूल से भाग के सनेमा वनेमा देखन लगा रहा पर हमरी समझ से इतना भी नाही कि ओके साथ हमका भी ई दिन देखे के पड़ा अब बाबू केकरा उम्मीद पर बाकि जिनगी कटी एक बबुआ का त हम बचपन्वे मा खो दी रही अनहि पर सगरो उम्मीद रही कहते बुधिया विलाप करते हुए दहाड़ मार कर गिर पड़ी ओंठों के बीच अनवरत बुदबुदाती रही बाबू फिर से विनती करत तानी तनी हमरे बाबू क चेहरवा त दिखा दिहित होई सकित है अभी जिन्दा होखब हे भगवन अब हम का करब दीना भगत उसको संभालने में लग गया अपने कलेजे पर पत्थर रख कर गमछे के एक कोर से कभी अपने आंसुओं को पोछता कभी राजन की माँ को संभालता उसके...

महान पत्रकार, पत्रकारिता जगत के सिरमौर - रूसी करंजिया

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"बाती बुझ गयी- देह दीप की व बाती जिससे अहंकार त्रस्त थे और नरभक्षी हवाएं बदहवास, आज का नवजात इतिहास- जब भी बोलेगा यही बोलेगा" पत्रकारिता जगत के निर्भीक महामानव रूसी करंजिया की याद आते ही उपरोक्त पंक्तियाँ बरबस होठों पर आ जाती हैं। एक पत्रकार बंधु ने रूसी को जब उपरोक्त पंक्तियाँ सुनाई तो रूसी करंजिया का मुखमंडल मुस्कान की झीनी आभा से दमक उठा था। उनके आसपास बैठे लोग चकित थे- उनकी आकृति की उर्जमायी छवि देखकर। रूसी करंजिया पंचानवे बसंत देख चुके थे। दुनिया को दिखा चुके थे कि निर्भीक एवं स्वतन्त्र पत्रकारिता के माने क्या होते हैं, कितने और क्या-क्या होते हैं उसके पहलू और पराक्रम। जाना तो था ही उन्हें, सो चले गए, किन्तु अपनी जो विरासत छोड़ गए उस पर, उनके जाते ही, एक चुनौतीबाचक प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है- है कोई शेर की छातीवाला वीर इस मीडिया में, जो रूसी करंजिया को आगे बाधा सके? रूसी करंजिया भारत में टेबोलायड पत्रकारिता के जनक माने जाते हैं। सही अर्थों में वे देश के प्रथम खोजी पत्रकार थे। ऐसे समय जब सारे अख़बार 'व्यवस्था पत्र' का चोला धारण कर रहे थे, करंजिया का अखबार व...