मशहूर टीवी जर्नलिस्ट बरखा दत्त भी यौन शोषण का शिकार हुईं थीं
बरखा ने 02 Dec 15 बुधवार को लॉन्च हुई अपनी किताब ‘This Unquiet Land - Stories from India's Fault Lines’ में इसका जिक्र किया है।
- बरखा लिखती हैं- “मैं 10 साल की भी नहीं थी, जब पहली बार मेरा यौन शोषण हुआ। यौन
शोषण करने वाला कोई और नहीं बल्कि दूर के एक रिश्तेदार थे। वे कुछ वक्त के लिए
हमारे घर रहने आए थे। दूसरे पंजाबी घरों की तरह मेरे घर के दरवाजे भी रिश्तेदारों
और दोस्तों के लिए खुले रहते थे। आज मैं उस रिश्तेदार के अपनी फैमिली के साथ
रिश्तों को याद नहीं कर पाती। लेकिन एक बच्चे की नजर में वह दूर का प्यारा चाचा या
मामा था। मुझे लगता था कि मैं अपने घर में सेफ हूं।”
- “केवल यह सोच पाती हूं कि एक ऐसा आदमी जिसकी पीठ पर बैठकर आप खुले
में खेलते हों, क्या वह राक्षस साबित हो सकता है? बचपन में हम समझ नहीं पाते कि हमारे
साथ क्या हो रहा है। लेकिन मैं उस चेहरे के पीछे छिपे दरिंदे और उसकी गंदगी को
नहीं पहचान पाई। हम आज भी अपने बच्चों को ‘गुड और बैड टच’ के बारे में ज्यादा समझा नहीं पाए
हैं। शुरुआत में कुछ मौकों के बाद मैं उस आदमी के साथ उसके ही रूम में खेलने जाती
रही। मैं दर्द और नफरत को उस वक्त भूल गई थी।”
- वे लिखती हैं- “गिल्ट और डर को हटाकर एक दिन मैंने अपनी मां को अपने साथ हो रही
हरकतों के बारे में बता दिया। उस रिश्तेदार को फौरन घर से बाहर निकाल दिया गया।
मैंने भी अपनी बुरी यादों को दफन करने की कोशिश की। इस उम्मीद के साथ कि जिंदगी
में मुझे फिर कभी इस तरह की चीजों का सामना नहीं करना पड़ेगा।”
- “वक्त के साथ मैं बड़ी होती गई, लेकिन उस आदमी के बालों में लगाए जाने
वाले तेल की बू मेरे जेहन से नहीं निकली। आज भी उस जैसे तेल की बदबू अगर मुझे आती
है तो ऐसा लगता है जैसे मैं बेहोश हो जाऊंगी। बड़े होने के साथ ही मैंने उस आदमी
का चेहरा और नाम भी याद नहीं रखना चाहा। अब मैं उस घटना को भुला चुकी हूं, लेकिन जब भी याद करती हूं तो ऐसा लगता
है जैसे यौन शोषण अपने पीछे एक बदबू छोड़ जाता है।”
- “यह इकलौता ऐसा हादसा था, जो बचपन में हुआ और जो किसी डराती हुई परछाईं की तरह मेरे साथ बड़े होने तक चलता रहा। बचपन में हुए यौन शोषण का डर इस कदर रहा कि अकसर बड़े होने पर भी मैं कुछ डरती रही। ये उन बच्चों के साथ होता ही है, जिनके साथ बचपन में इस तरह की घटना हुई हो।”
- “यह इकलौता ऐसा हादसा था, जो बचपन में हुआ और जो किसी डराती हुई परछाईं की तरह मेरे साथ बड़े होने तक चलता रहा। बचपन में हुए यौन शोषण का डर इस कदर रहा कि अकसर बड़े होने पर भी मैं कुछ डरती रही। ये उन बच्चों के साथ होता ही है, जिनके साथ बचपन में इस तरह की घटना हुई हो।”
- बरखा ने अपनी किताब में लिखा, “उस वक्त समझ नहीं पाई थी लेकिन जो
मेरे साथ हुआ वह भयानक था। लेकिन यह अनकॉमन हो, ऐसा भी नहीं है। 2007 में सरकार ने
बच्चों के यौन शोषण से जुड़े आंकड़े जारी किए। इनसे पता चला कि करीब 53 फीसदी बच्चे किसी न किसी तरह के यौन
शोषण का शिकार होते हैं। 20% बच्चों ने बताया कि वे गंभीर तरह के यौन शोषण का शिकार हुए। इस तरह
की घटनाओं को सेक्सुअल असॉल्ट या यौन हमला कहा जाता है।’’
- ‘‘आज भी, बदनामी की वजह से यंग विक्टिम्स इस तरह के क्रिमिनल्स का नाम नहीं
बताते। लेकिन ये वो लोग होते हैं जो फैमिली से जुड़े होते हैं। उनको बाहर निकालना
मुश्किल होता है। रिपोर्ट बताती है कि सेक्सुअल असॉल्ट करने वाले 31% लोग रिश्तेदार या
पड़ोसी होते हैं। इसलिए हैरानी नहीं कि 70% बच्चे कभी ये नहीं बताते कि उनके साथ
किसने और क्या किया।”
- “मेरे लिए सबसे मुश्किल बात यह पता लगाना है कि क्यों महिला होने की
वजह से शर्म, बदनामी या कन्फ्यूजन हमारे दिमाग में आता है? इनका इस्तेमाल यौन शोषण के लिए क्यों
किया जाता है?”
भेदभाव करता है कानून
- “मैं दिल्ली की जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में पोस्ट ग्रेजुएशन की
स्टूडेंट थी। इस दौरान पर्सनल रिलेशनशिप में मुझे वॉयलेंस का सामना करना पड़ा।
हालांकि, अब मैं उतनी कन्फ्यूज नहीं थी। मुझे यकीन था कि अगर वो आदमी जिसको
मैं डेट कर रही हूं, अगर मुझे पीटता है तो उससे कैसे निपटना है। मैं उसे पुलिस के सामने
तक ले जाना चाहती थी। लेकिन फिर मुझे अहसास हुआ कि हमारा कानून महिलाओं को लेकर
कितना भेदभाव वाला है। हालांकि ये भी सही है कि इसको आप तब तक महसूस नहीं कर सकते
जब तक कि इस तरह के हालात आपके साथ न बनें।”
- बरखा लिखती हैं, “मैं कुछ वक्त के लिए जामिया में अपने एक साथी के साथ रिलेशनशिप में रही। यहां माहौल बिल्कुल अलग था। टेंशन में लोग स्मोकिंग करते थे। खुद को मैं वहां मिसफिट पाती थी। वजह ये थी कि न तो मैं स्मोकिंग करती थी और न ड्रिंक। वहां ये माना जाता था कि अगर आप क्रिएटिव फील्ड में हैं तो आपको सेक्सुअल कम्प्रोमाइज कर लेने चाहिए। मैं एक सिनेमैटोग्राफर के साथ रिलेशन में आ गई, लेकिन जल्द ही महसूस हुआ कि ये मेरे लिए सही नहीं है। एक दिन जब मैंने उससे रिश्ता तोड़ देने की बात कही तो उसने रेजर से अपनी कलाई काट ली। चाहते हुए भी उस दिन मैं रिश्ता तोड़ नहीं पाई।”
- बरखा लिखती हैं, “मैं कुछ वक्त के लिए जामिया में अपने एक साथी के साथ रिलेशनशिप में रही। यहां माहौल बिल्कुल अलग था। टेंशन में लोग स्मोकिंग करते थे। खुद को मैं वहां मिसफिट पाती थी। वजह ये थी कि न तो मैं स्मोकिंग करती थी और न ड्रिंक। वहां ये माना जाता था कि अगर आप क्रिएटिव फील्ड में हैं तो आपको सेक्सुअल कम्प्रोमाइज कर लेने चाहिए। मैं एक सिनेमैटोग्राफर के साथ रिलेशन में आ गई, लेकिन जल्द ही महसूस हुआ कि ये मेरे लिए सही नहीं है। एक दिन जब मैंने उससे रिश्ता तोड़ देने की बात कही तो उसने रेजर से अपनी कलाई काट ली। चाहते हुए भी उस दिन मैं रिश्ता तोड़ नहीं पाई।”
- “अगली बार जब हम मिले तो मैंने उससे कहा कि मैं रिश्ता तोड़ना चाहती
हूं। उसने मुझे जमीन पर गिराया और ज्यादती की कोशिश की। मैंने उसे थप्पड़ मार
दिया। इसके बाद उसने मुझे बुरी तरह पीटा और दीवार से टकरा दिया। मैं गुस्से में
वहां से निकल गई।”
- “ये 1990 के आसपास की बात थी। मैं यूनिवर्सिटी और पुलिस में शिकायत दर्ज
कराना चाहती थी। लेकिन उस वक्त न तो रेप से जुड़े कानून थे और न इनको रोकने के लिए
गाइड लाइन्स। वहां कुछ महिलाएं प्रोग्रेसिव जरूर थीं लेकिन वो काफी प्रैक्टिकल भी
थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि डिग्री में दो साल बचे हैं। किसी मामले में मत फंसो।
बाद में मुझे पता लगा कि वह आदमी कुछ और लड़कियों के साथ भी यही सलूक कर चुका है।
मैंने अपना डिपार्टमेंट ही बदल लिया। फिर भी वहां होने वाली गॉसिप्स का मुझे पता
चलता रहा।”
- “1994 में जब मुझे एनडीटीवी से जॉब का ऑफर आया तो मैंने केवल एक शर्त रखी। मैंने कहा कि उस आदमी को आप कैमरामैन के तौर पर अप्वाइंट नहीं करेंगे। उन्होंने मेरी शर्त मान ली। मैंने उस आदमी को फिर कभी नहीं देखा।”
- “1994 में जब मुझे एनडीटीवी से जॉब का ऑफर आया तो मैंने केवल एक शर्त रखी। मैंने कहा कि उस आदमी को आप कैमरामैन के तौर पर अप्वाइंट नहीं करेंगे। उन्होंने मेरी शर्त मान ली। मैंने उस आदमी को फिर कभी नहीं देखा।”
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