मोहनिया...मोहनदास...महात्मा गांधी
गांधीजी पर बेहद चर्चित और प्रशंसित उपन्यास पहला गिरमिटिया के लेखक गिरिराज किशोर ने उनका विश्लेषण करते हुए लिखा है - महात्मा गाँधी के जीवन के तीन पक्ष हैं-एक ‘मोहनिया पक्ष’, दूसरा ‘मोहनदास पक्ष’, तीसरा ‘महात्मा गाँधी पक्ष’। हर आदमी के जीवन में ऐसा विभाजन होता है। परन्तु किसी भी महान् व्यक्ति के जीवन के विकास के सन्दर्भ में ये पक्ष महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। कृष्ण के जीवन में भी इसी तरह कान्हा या गोपाल पक्ष, कृष्ण पक्ष, योगिराज कृष्ण पक्ष थे।
बैरिस्टरी से लेकर दक्षिण अफ़्रीका से लौटने तक उनका मोहनदास रूप है या गाँधी भाई रूप। बीच-बीच में उनका मोहनिया रूप भी आता रहता है। कभी शेख़ मेहताब के माध्यम से, कभी कस्तूर के माध्यम से, कभी बा और बापू के माध्यम से और कभी उनकी याद के जरिए...गांधीजी को हम जिस भी रूप में देखना चाहें, वह उस रूप में सबसे अलग और प्रभावी दिखते हैं।
यही वजह है कि वह अमेरिकी राष्ट्रेपति बराक ओबामा के भी आदर्श हैं और चीन जैसा भारत का पड़ोसी भी उन्हें अपने यहां सम्माचन देता है। यहां बता दें कि बीजिंग में महात्मा गांधी ही इकलौते भारतीय नेता हैं, जिनकी प्रतिमा सार्वजनिक स्थतल पर सरकार की ओर से लगाई गई है।वैसे तो गांधी को कई रूपों में देखा जा सकता है, लेकिन हमने आज उनकी 141वीं जयंती पर उनके अलग-अलग रूपों को देखने की कोशिश की है। वह भी अलग-अलग क्षेत्र की मशहूर हस्तियों की नजर से।
गांधीजी गुरु के रूप में- प्रोफेसर यशपाल
गांधी जी अपने शब्दों से नहीं बल्कि अपनी जिंदगी से शिक्षा देते थे। उन्होंने शब्दों से किसी को कुछ सिखाने की कोशिश नहीं की। वह जो कहना चाहते थे अपने कार्यकलापों से करके दिखा देते थे। उनके शब्दों के साथ जिंदगी जुड़ी हुई थी।
महात्मा गांधी के रहने के तरीके से शिक्षा मिलती है। उनकी जिंदगी और उनके रहने के तरीके में बड़ा समन्वय था। इनके जरिये वह सब कुछ कह जाते थे। बड़ी-बड़ी बातें करना उनकी आदत में शुमार नहीं था। उनका एक वाक्य लीजिए जिसमें उन्होंने कहा-जहां सत्य है, वहां भगवान है। यह सुनने मे बड़ा साधारण लगता है। लेकिन ध्यान से देखें तो समझ में आएगा कि उन्होंने कितनी बड़ी बात कह दी। इन शब्दों के माध्यम से उन्होंने जीवन का पूरा दर्शन उड़ेल दिया।
महात्मा गांधी ने बताया कि सीखना सिर्फ किताबें पढ़ने से नहीं होता, जिंदगी से जुड़ने से भी होता है। यही कारण है कि उनकी छोटी-छोटी बातें भी बड़ी मानी जाती हैँ। वह सिद्धांतों में विश्वास नहीं करते थे बल्कि जिंदगी में उसे करके दिखाने में विश्वास करते थे।
उनका कहना था-जीवन से जुड़ जाओ, उद्देश्य अपने आप निकल आएगा। उद्देश्य का तरीका आपके काम करने के तरीके से निकलता है। नमक आंदोलन से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। इसी तरह अन्य आंदोलनों से वह बहुत कुछ सीखते रहते थे।
आजकल हर कोई एक सवाल पूछता है-इस काम से क्या फायदा होगा। लेकिन महात्मा गांधी ने यह सवाल तो कभी पूछा नहीं। वह कहते थे कि कुछ करने के लिए सबसे गरीब से पूछिए कि उसे क्या चाहिए, आपके सवाल का जवाब इसी में छुपा हुआ है। वह गरीबों और असहाय लोगों की मदद को तैयार रहते थे और इस तरह से सभी को प्रेरित करते थे। महात्मा गांधी सच्चे गुरू थे जो सोच बदलने के तरीके में विश्वास करते थे। वह कर्म में विश्वास करते थे न कि वचन में। सारी दुनिया में ऐसे गुरू विरले ही मिलेंगे।
(प्रोफेसर यशपाल यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात शिक्षाविद हैं।)
गांधीजी लेखक के रूप में-चेतन भगत
गांधीजी ने जितनी सरल भाषा में कठिन से कठिन विषयों पर लेख लिखे, वे वाकई तारीफ के काबिल हैं। उनकी लेखनी का समाज पर काफी प्रभाव पड़ा। उन्होंने भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए तो प्रेरित किया ही, साथ ही समाज में फैली कुरीतियों पर भी गहरे प्रहार किए।
हिंदू-मुस्लिम एकता पर उन्होंकने जो लिखा, वह आज भी प्रासंगिक और प्रेरणा लेने लायक है।महात्मा गांधी की लेखन प्रतिभा का एक अंश भी मुझमें आ जाए तो मैं खुद को सफल लेखक मानूंगा। वैसे तो मैं गांधी के पूरे व्यक्तित्व से प्रभावित हूं, लेकिन उनके लेखक रूप ने मुझ पर खास छाप डाली है। उनकी खुद की लिखी हुई जीवनी ‘द स्टोरी ऑफ माय एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ’ हर समय प्रासंगिक है। सच के साथ किए गए प्रयोगों को उन्होंने इतनी सरल भाषा में पेश किया है कि वे आज भी किसी को सहज प्रेरित कर सकते हैं।
गांधी आज जीवित होते तो करीब 140 साल के होते। आज फिर देश को उनकी लेखनी की जरूरत है। आज हमारे देश में कई नेता हैं जिन्होंने अपने दफ्तरों में उनकी तस्वीरें लगा रखी हैं। जो उनकी तरह कपड़े पहनते हैं और भोजन करते हैं लेकिन क्या वे जनता को प्रभावित कर पाते हैं? क्या किसी लेखक की लेखनी में इतनी ताकत है कि पूरा देश और समाज न केवल उन्हें माने, बल्कि उनके पीछे चले? शायद नहीं। इसलिए आज फिर देश को उनके जैसे लेखक और समाजसेवक की जरूरत है।
मैंने महात्मा गांधी की तमाम रचनाएं पढ़ी हैं और सभी में उन्होंने अपनी लेखन क्षमता से मुझे जबर्दस्त प्रभावित किया है। गांधीजी की लेखनी में कई विषयों पर प्रकाश डाला गया है। इनमें शाकाहार, हिंदू धर्म, शिक्षा, पंचायत राज, ग्रामीण उद्योग जैसे विषय शामिल किए गए हैं। यानी करीब-करीब वे सभी विषय, जो समाज को जगा सकते थे।
'गांधी की लेखन प्रतिभा का एक अंश भी मुझमें आ जाए तो खुद को सफल मानूंगा'-चेतन भगत, लेखक
(भगत ‘फाइव पाइंट समवन’ और ‘वन नाइट एट कॉल सेंटर’ जैसी चर्चित किताबें लिख चुके हैं और भारत के युवा लेखक के रूप में उनकी पुख्तास पहचान है)
गांधीजी मैनेजमेंट सीईओ के रूप में-प्रमोद जोशी
गांधी जी एक बेहतरीन सीईओ थे। एक योग्य सीईओ की तरह वह भविष्य की तसवीर पेश कर देते थे और उसे अपने लोगों के सामने रखते थे। एक बढ़िया सीईओ की निशानी है कि वह भविष्य में झांक सके। गांधी जी में यह गुण भरपूर था।
वह मूल्यों में विश्वास करते थे। इनका उन्होंने कभी साथ नहीं छोड़ा। वह साधारण लोगों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के बड़े नेताओं तक को इनके लिए प्रोत्साहित करते थे। यह एक अच्छे सीईओ का गुण है। गांधी जी का आध्यात्मिक नेतृत्व गजब के था। वह उस हर समाज के सांस्कृतिक पहलुओं और फर्क को समझते थे जिनसे उन्हें काम लेना होता था या जिनसे उन्हें जुड़ना होता था। उन्हें मानवीय मनोविज्ञान की गहरी समझ थी। और यह एक सफल सीईओ की बेहतरीन निशानी है।
वह कम्युनिकेशन और जनसंपर्क में सबसे आगे थे। वह अपनी बात कहने के लिए अपने वाक्य कौशल का पूरा इस्तेमाल करते थे। उनका मीडिया से बहुत बढ़िया तालमेल था। इसलिए अंग्रेजों के जमाने में भी उनके कार्यक्रमों को काफी लोकप्रियता मिली। इसका सबसे अच्छा उदाहरण डांडी मार्च था। मीडिया के सही इस्तेमाल से उन्होंने अपनी पूरी बात कह दी और लोगों को आगे आने के लिए प्रेरित किया। उनमें टॉप क्लास सीईओ का एक बड़ा गुण यह था कि वह कॉन्फलिक्ट मैनेजमेंट बेहतरीन ढंग से करते थे।
वह लोगों को हमेशा उनके अंतिम लक्ष्य के बारे में बताते थे। वह अपने लोगों को भविष्य की एक बड़ी तस्वीर दिखाते थे। फिर उन्हें उसके बारे में आश्वस्त करते थे। लक्ष्य बताना और उसे पाने के बारे में विश्वास के साथ बताना बड़ी बात है। दुनिया के सफलतम सीईओ की यही तो पहचान रही है। गांधी जी खुद आगे बढ़कर कोई भी काम पहले करते थे यानी दूसरों से कहने के पहले खुद करके आश्वस्त हो लेते। दुनिया के जितने सफल सीईओ हुए हैं उन सबकी सफलता का राज ही यही था।
(प्रमोद जोशी एमटेक आईआईटी बीएचयू, एमबीए आईआईएम)
अभिनेता के रूप में गांधी लाजवाब होते-दर्शन जरीवाला
गांधीजी अपने जीवन के दौरान भी एक सार्वजनिक छवि थे और आज भी हैं| मैं बहुत खुशनसीब हूं कि गुजराती होने के नाते मुझे उनके कार्यों के बारे में पढ़ने को मिला| उनके बारे में गुजराती में पढ़ने के लिए काफी कुछ सामग्री उपलब्ध है| उनके बारे में गुजराती में पढ़ने जो मजा है वह ट्रांसलेटेड की हुई सामग्री पढ़ने में नहीं|
वह एक ऐसे इंसान हैं जिन्होंने अपने विचारों को एक दम सही ढंग से प्रस्तुत किया| उनके विचारों में एक ईमानदारी झलकती है जिससे यह साफ़ हो जाता है कि लोग उनका अनुसरण क्यों करते हैं और क्यों उन्हें इतना पसंद करते हैं|
वह अंतर्मुखी स्वभाव के थे और उन्हें बच्चों की कंपनी बेहद पसंद थी| उन्हें साफ़ सुथरे कपड़े पहनना अच्छा लगता था और इसके अलावा जानवरों और पेड़ पोधों से काफी लगाव था| वह एक ऐसे इंसान थे जो अपनी कमियों को स्वीकारने में कभी नहीं हिचकिचाते थे| वह करिश्माई व्यक्तित्व के धनी थे और साथ ही तर्कसंगत भी थे| गांधीजी अपने समय के समय के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति थे| उनकी ऊर्जा का स्त्रोत भगवद गीता हुआ करती थी| गांधी जी ने अपने जीवन में हमेशा सत्य,अहिंसा और भारतीय मूल्यों का अनुसरण किया|
गांधी माय फादर में मुझे गांधीजी के किरदार को जीवंत करने का मौका मिला| मुझे लगता है कि कभी गांधी अभिनेता बनाते तो लाजवाब होते, क्योंकि उनकी ऊर्जा का स्त्रोत अक्षय था, किसी खासे सुपरस्टार अभिनेता में यही तो उसकी सफलता के पीछे सबसे मौलिक गुण होता है। गांधीजी ने अपने जीवन में मूल्यों को खासी अहमियत दी थीवहीं इस फिल्म में उनके पुत्र में उनकी छवि ढूंढने की एक बेहतरीन कोशिश की गई थी|
(दर्शन जरीवाला प्रख्यात अभिनेता हैं, कई फिल्मों में गांधीजी का किरदार निभाया)
गांधीजी पत्रकार के रूप में
पत्रकारिता की किताबों में एक किस्सा चलता है- एक बार तब के टाइम्स आफ इंडिया के एडिटर ने एक प्रशिक्षु पत्रकार को अपने पास बुलाया। उसकी कॉपी उसकी ओर फेंकते हुए बोले-इंडिया में सबसे बढ़िया अंग्रेजी कौन बोलता है। प्रशिक्षु ने ढेरों अंग्रेजी पत्रकारों-साहित्यकारों के नाम गिना दिए।
गलत एडिटर बोले। तुम्हें पता है इंडिया में सबसे बढ़िया अंग्रेजी बोलते है गांधी तुम्हारा महात्मा गांधी। वो बोलता है क्विट इंडिया अनपढ़ जनता समझ जाती है, वो बोलता है सिविल डिसओबिडियंस लोग साथ खड़े हो जाते हैं, वो बोलता है डू और डाय लोग जान देने पर उतारू हो जाते हैं, ये होती है शब्दों की ताकत, इस देश की करोड़ों अनपढ़ लोग उसकी अंग्रेजी समझ जाते हैं। तुम्हारी आक्सफोर्ड-कैंब्रिज की अंग्रेजी यहां कुछ नहीं कर सकती। सीखना हो तो उससे जाकर पत्रकारिता के सरल शब्द सीखो। यदि तुम्हारी यह आभिजात्य अंग्रेजी किसी बात को लोगों तक पहुंचा ही नहीं सकती तो फिर क्या फायदा पन्ने काले करने का...।
पत्रकारिता के लिए प्रशिक्षुओं के लिए लाखों शब्द भी इस स्तर की एक बात नहीं कह सकते हैं। यही गांधीजी की ताकत है। गांधी नाम की ताकत है। गांधीजी की पत्रकारिता आमलोगों की, दलितों की, आम सरोकारों की पत्रकारिता थी। नवजीवन, इंडियन ओपिनियन, हरिजन जैसे अखबारों के माध्यम से उन्होंने लोगों के बीच लोगों की आवाज रखी थी।
बैरिस्टरी से लेकर दक्षिण अफ़्रीका से लौटने तक उनका मोहनदास रूप है या गाँधी भाई रूप। बीच-बीच में उनका मोहनिया रूप भी आता रहता है। कभी शेख़ मेहताब के माध्यम से, कभी कस्तूर के माध्यम से, कभी बा और बापू के माध्यम से और कभी उनकी याद के जरिए...गांधीजी को हम जिस भी रूप में देखना चाहें, वह उस रूप में सबसे अलग और प्रभावी दिखते हैं।
यही वजह है कि वह अमेरिकी राष्ट्रेपति बराक ओबामा के भी आदर्श हैं और चीन जैसा भारत का पड़ोसी भी उन्हें अपने यहां सम्माचन देता है। यहां बता दें कि बीजिंग में महात्मा गांधी ही इकलौते भारतीय नेता हैं, जिनकी प्रतिमा सार्वजनिक स्थतल पर सरकार की ओर से लगाई गई है।वैसे तो गांधी को कई रूपों में देखा जा सकता है, लेकिन हमने आज उनकी 141वीं जयंती पर उनके अलग-अलग रूपों को देखने की कोशिश की है। वह भी अलग-अलग क्षेत्र की मशहूर हस्तियों की नजर से।
गांधीजी गुरु के रूप में- प्रोफेसर यशपाल
गांधी जी अपने शब्दों से नहीं बल्कि अपनी जिंदगी से शिक्षा देते थे। उन्होंने शब्दों से किसी को कुछ सिखाने की कोशिश नहीं की। वह जो कहना चाहते थे अपने कार्यकलापों से करके दिखा देते थे। उनके शब्दों के साथ जिंदगी जुड़ी हुई थी।
महात्मा गांधी के रहने के तरीके से शिक्षा मिलती है। उनकी जिंदगी और उनके रहने के तरीके में बड़ा समन्वय था। इनके जरिये वह सब कुछ कह जाते थे। बड़ी-बड़ी बातें करना उनकी आदत में शुमार नहीं था। उनका एक वाक्य लीजिए जिसमें उन्होंने कहा-जहां सत्य है, वहां भगवान है। यह सुनने मे बड़ा साधारण लगता है। लेकिन ध्यान से देखें तो समझ में आएगा कि उन्होंने कितनी बड़ी बात कह दी। इन शब्दों के माध्यम से उन्होंने जीवन का पूरा दर्शन उड़ेल दिया।
महात्मा गांधी ने बताया कि सीखना सिर्फ किताबें पढ़ने से नहीं होता, जिंदगी से जुड़ने से भी होता है। यही कारण है कि उनकी छोटी-छोटी बातें भी बड़ी मानी जाती हैँ। वह सिद्धांतों में विश्वास नहीं करते थे बल्कि जिंदगी में उसे करके दिखाने में विश्वास करते थे।
उनका कहना था-जीवन से जुड़ जाओ, उद्देश्य अपने आप निकल आएगा। उद्देश्य का तरीका आपके काम करने के तरीके से निकलता है। नमक आंदोलन से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। इसी तरह अन्य आंदोलनों से वह बहुत कुछ सीखते रहते थे।
आजकल हर कोई एक सवाल पूछता है-इस काम से क्या फायदा होगा। लेकिन महात्मा गांधी ने यह सवाल तो कभी पूछा नहीं। वह कहते थे कि कुछ करने के लिए सबसे गरीब से पूछिए कि उसे क्या चाहिए, आपके सवाल का जवाब इसी में छुपा हुआ है। वह गरीबों और असहाय लोगों की मदद को तैयार रहते थे और इस तरह से सभी को प्रेरित करते थे। महात्मा गांधी सच्चे गुरू थे जो सोच बदलने के तरीके में विश्वास करते थे। वह कर्म में विश्वास करते थे न कि वचन में। सारी दुनिया में ऐसे गुरू विरले ही मिलेंगे।
(प्रोफेसर यशपाल यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष और प्रख्यात शिक्षाविद हैं।)
गांधीजी लेखक के रूप में-चेतन भगत
गांधीजी ने जितनी सरल भाषा में कठिन से कठिन विषयों पर लेख लिखे, वे वाकई तारीफ के काबिल हैं। उनकी लेखनी का समाज पर काफी प्रभाव पड़ा। उन्होंने भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए तो प्रेरित किया ही, साथ ही समाज में फैली कुरीतियों पर भी गहरे प्रहार किए।
हिंदू-मुस्लिम एकता पर उन्होंकने जो लिखा, वह आज भी प्रासंगिक और प्रेरणा लेने लायक है।महात्मा गांधी की लेखन प्रतिभा का एक अंश भी मुझमें आ जाए तो मैं खुद को सफल लेखक मानूंगा। वैसे तो मैं गांधी के पूरे व्यक्तित्व से प्रभावित हूं, लेकिन उनके लेखक रूप ने मुझ पर खास छाप डाली है। उनकी खुद की लिखी हुई जीवनी ‘द स्टोरी ऑफ माय एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ’ हर समय प्रासंगिक है। सच के साथ किए गए प्रयोगों को उन्होंने इतनी सरल भाषा में पेश किया है कि वे आज भी किसी को सहज प्रेरित कर सकते हैं।
गांधी आज जीवित होते तो करीब 140 साल के होते। आज फिर देश को उनकी लेखनी की जरूरत है। आज हमारे देश में कई नेता हैं जिन्होंने अपने दफ्तरों में उनकी तस्वीरें लगा रखी हैं। जो उनकी तरह कपड़े पहनते हैं और भोजन करते हैं लेकिन क्या वे जनता को प्रभावित कर पाते हैं? क्या किसी लेखक की लेखनी में इतनी ताकत है कि पूरा देश और समाज न केवल उन्हें माने, बल्कि उनके पीछे चले? शायद नहीं। इसलिए आज फिर देश को उनके जैसे लेखक और समाजसेवक की जरूरत है।
मैंने महात्मा गांधी की तमाम रचनाएं पढ़ी हैं और सभी में उन्होंने अपनी लेखन क्षमता से मुझे जबर्दस्त प्रभावित किया है। गांधीजी की लेखनी में कई विषयों पर प्रकाश डाला गया है। इनमें शाकाहार, हिंदू धर्म, शिक्षा, पंचायत राज, ग्रामीण उद्योग जैसे विषय शामिल किए गए हैं। यानी करीब-करीब वे सभी विषय, जो समाज को जगा सकते थे।
'गांधी की लेखन प्रतिभा का एक अंश भी मुझमें आ जाए तो खुद को सफल मानूंगा'-चेतन भगत, लेखक
(भगत ‘फाइव पाइंट समवन’ और ‘वन नाइट एट कॉल सेंटर’ जैसी चर्चित किताबें लिख चुके हैं और भारत के युवा लेखक के रूप में उनकी पुख्तास पहचान है)
गांधीजी मैनेजमेंट सीईओ के रूप में-प्रमोद जोशी
गांधी जी एक बेहतरीन सीईओ थे। एक योग्य सीईओ की तरह वह भविष्य की तसवीर पेश कर देते थे और उसे अपने लोगों के सामने रखते थे। एक बढ़िया सीईओ की निशानी है कि वह भविष्य में झांक सके। गांधी जी में यह गुण भरपूर था।
वह मूल्यों में विश्वास करते थे। इनका उन्होंने कभी साथ नहीं छोड़ा। वह साधारण लोगों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के बड़े नेताओं तक को इनके लिए प्रोत्साहित करते थे। यह एक अच्छे सीईओ का गुण है। गांधी जी का आध्यात्मिक नेतृत्व गजब के था। वह उस हर समाज के सांस्कृतिक पहलुओं और फर्क को समझते थे जिनसे उन्हें काम लेना होता था या जिनसे उन्हें जुड़ना होता था। उन्हें मानवीय मनोविज्ञान की गहरी समझ थी। और यह एक सफल सीईओ की बेहतरीन निशानी है।
वह कम्युनिकेशन और जनसंपर्क में सबसे आगे थे। वह अपनी बात कहने के लिए अपने वाक्य कौशल का पूरा इस्तेमाल करते थे। उनका मीडिया से बहुत बढ़िया तालमेल था। इसलिए अंग्रेजों के जमाने में भी उनके कार्यक्रमों को काफी लोकप्रियता मिली। इसका सबसे अच्छा उदाहरण डांडी मार्च था। मीडिया के सही इस्तेमाल से उन्होंने अपनी पूरी बात कह दी और लोगों को आगे आने के लिए प्रेरित किया। उनमें टॉप क्लास सीईओ का एक बड़ा गुण यह था कि वह कॉन्फलिक्ट मैनेजमेंट बेहतरीन ढंग से करते थे।
वह लोगों को हमेशा उनके अंतिम लक्ष्य के बारे में बताते थे। वह अपने लोगों को भविष्य की एक बड़ी तस्वीर दिखाते थे। फिर उन्हें उसके बारे में आश्वस्त करते थे। लक्ष्य बताना और उसे पाने के बारे में विश्वास के साथ बताना बड़ी बात है। दुनिया के सफलतम सीईओ की यही तो पहचान रही है। गांधी जी खुद आगे बढ़कर कोई भी काम पहले करते थे यानी दूसरों से कहने के पहले खुद करके आश्वस्त हो लेते। दुनिया के जितने सफल सीईओ हुए हैं उन सबकी सफलता का राज ही यही था।
(प्रमोद जोशी एमटेक आईआईटी बीएचयू, एमबीए आईआईएम)
अभिनेता के रूप में गांधी लाजवाब होते-दर्शन जरीवाला
गांधीजी अपने जीवन के दौरान भी एक सार्वजनिक छवि थे और आज भी हैं| मैं बहुत खुशनसीब हूं कि गुजराती होने के नाते मुझे उनके कार्यों के बारे में पढ़ने को मिला| उनके बारे में गुजराती में पढ़ने के लिए काफी कुछ सामग्री उपलब्ध है| उनके बारे में गुजराती में पढ़ने जो मजा है वह ट्रांसलेटेड की हुई सामग्री पढ़ने में नहीं|
वह एक ऐसे इंसान हैं जिन्होंने अपने विचारों को एक दम सही ढंग से प्रस्तुत किया| उनके विचारों में एक ईमानदारी झलकती है जिससे यह साफ़ हो जाता है कि लोग उनका अनुसरण क्यों करते हैं और क्यों उन्हें इतना पसंद करते हैं|
वह अंतर्मुखी स्वभाव के थे और उन्हें बच्चों की कंपनी बेहद पसंद थी| उन्हें साफ़ सुथरे कपड़े पहनना अच्छा लगता था और इसके अलावा जानवरों और पेड़ पोधों से काफी लगाव था| वह एक ऐसे इंसान थे जो अपनी कमियों को स्वीकारने में कभी नहीं हिचकिचाते थे| वह करिश्माई व्यक्तित्व के धनी थे और साथ ही तर्कसंगत भी थे| गांधीजी अपने समय के समय के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति थे| उनकी ऊर्जा का स्त्रोत भगवद गीता हुआ करती थी| गांधी जी ने अपने जीवन में हमेशा सत्य,अहिंसा और भारतीय मूल्यों का अनुसरण किया|
गांधी माय फादर में मुझे गांधीजी के किरदार को जीवंत करने का मौका मिला| मुझे लगता है कि कभी गांधी अभिनेता बनाते तो लाजवाब होते, क्योंकि उनकी ऊर्जा का स्त्रोत अक्षय था, किसी खासे सुपरस्टार अभिनेता में यही तो उसकी सफलता के पीछे सबसे मौलिक गुण होता है। गांधीजी ने अपने जीवन में मूल्यों को खासी अहमियत दी थीवहीं इस फिल्म में उनके पुत्र में उनकी छवि ढूंढने की एक बेहतरीन कोशिश की गई थी|
(दर्शन जरीवाला प्रख्यात अभिनेता हैं, कई फिल्मों में गांधीजी का किरदार निभाया)
गांधीजी पत्रकार के रूप में
पत्रकारिता की किताबों में एक किस्सा चलता है- एक बार तब के टाइम्स आफ इंडिया के एडिटर ने एक प्रशिक्षु पत्रकार को अपने पास बुलाया। उसकी कॉपी उसकी ओर फेंकते हुए बोले-इंडिया में सबसे बढ़िया अंग्रेजी कौन बोलता है। प्रशिक्षु ने ढेरों अंग्रेजी पत्रकारों-साहित्यकारों के नाम गिना दिए।
गलत एडिटर बोले। तुम्हें पता है इंडिया में सबसे बढ़िया अंग्रेजी बोलते है गांधी तुम्हारा महात्मा गांधी। वो बोलता है क्विट इंडिया अनपढ़ जनता समझ जाती है, वो बोलता है सिविल डिसओबिडियंस लोग साथ खड़े हो जाते हैं, वो बोलता है डू और डाय लोग जान देने पर उतारू हो जाते हैं, ये होती है शब्दों की ताकत, इस देश की करोड़ों अनपढ़ लोग उसकी अंग्रेजी समझ जाते हैं। तुम्हारी आक्सफोर्ड-कैंब्रिज की अंग्रेजी यहां कुछ नहीं कर सकती। सीखना हो तो उससे जाकर पत्रकारिता के सरल शब्द सीखो। यदि तुम्हारी यह आभिजात्य अंग्रेजी किसी बात को लोगों तक पहुंचा ही नहीं सकती तो फिर क्या फायदा पन्ने काले करने का...।
पत्रकारिता के लिए प्रशिक्षुओं के लिए लाखों शब्द भी इस स्तर की एक बात नहीं कह सकते हैं। यही गांधीजी की ताकत है। गांधी नाम की ताकत है। गांधीजी की पत्रकारिता आमलोगों की, दलितों की, आम सरोकारों की पत्रकारिता थी। नवजीवन, इंडियन ओपिनियन, हरिजन जैसे अखबारों के माध्यम से उन्होंने लोगों के बीच लोगों की आवाज रखी थी।
बापू! मै भारत का वासी, तेरी निशानी ढूंढ रहा हूँ.
ReplyDeleteबापू! मै तेरे सिद्धान्त, दर्शन,सद्विचार को ढूंढ रहा हूँ.
सत्य अहिंसा अपरिग्रह, यम नियम सब ढूंढ रहा हूँ.
बापू! तुझको तेरे देश में, दीपक लेकर ढूंढ रहा हूँ.
कहने को तुम कार्यालय में हो, न्यायालय में हो,
जेब में हो, तुम वस्तु में हो, सभा में मंचस्थ भी हो,
कंठस्थ भी हो, हो तुम इतने ..निकट - सन्निकट...,
परन्तु बापू! सच बताना आचरण में तुम क्यों नहीं हो?